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Wednesday, 25 May 2016

तन्हाई मेरे साथी

तन्हाइयों से क्या शिकवा करें, जख्म तो हैं मिले महफ़िलो से हमें । रास आये न हम मंजिलो को कभी, रास्तो से मोहब्बत मिली है हमें ।।

तुमको पाने की थी होड़ ऐसी लगी, जैसे सांसो से था वास्ता कुछ तेरा । मुड़ के देखा जो तब ये समझ आया की तुमको पाये न हम खुद को खोते गये ।।

राहतों का समंदर लगा जो कभी, उसकी चाहत में नदियों को छोड़ आये हम । पलकें भीगी रही दिल तड़पता रहा, प्यास भी न बुझी डूबते भी गए ।।

सोहबतों ने मेरी खूब टोका हमें, जा ठहर, सोच, मुड़, लौट आ अब भी तू । हम न सुन ही सके न समझ पाए हम, ना ही तेरे बने न ही घर के रहे ।।

अब तो मंज़र है ये खुद से भी दूर हूँ, खुद को भी इस तरह न मैं मंजूर हु । वक्त ऐसा है बस तन्हाइयां संग है, सारे सपने भी हमसे हैं रूठे हुए ।।
    कुंदन विद्यार्थी

Thursday, 25 April 2013

दहाड़ता हुआ सा 2

आज का दिन बड़ा ही खास है, क्यूंकि आज किसी खास का जन्मदिन है. मेरी तरफ से उसे बहुत सारी सुभकामनाये. और मैं चाहूँगा के आप सब भी उसके लिए दुआ करें. वो हमेशा हँसता  और मुस्कुराता रहे. चंद शेर उसके नाम समर्पित करता हूँ मैं आज फिर. यूँ तो मेरे सारे शब्द ही उसकी अमानत हैं. पर कभी कभी गुस्ताखी करने का दिल कर जाता है.



सुबह के नज़ारे से तुम्हें मांगते हैं,
शाम के धुंधलके से तुम्हें मांगते हैं,
चाँद की तपिश भी ठंडी पर जाती जब,
इसके उजालों से तुम्हें मांगते हैं//

चाँद को गुरूर अपनी चांदनी पे है,
मुझको यकीं तेरी रौशनी पे है,
बादलों में छुप गया न जाने वो कहाँ,
यूँ जाला वो चाँद तेरी रौशनी से है//

कुछ यूँ समेत लेती हो लहराती जुल्फों को,
सारे बिखरे बादल जैसे छुप से जाते हैं तेरी गेशुओं में//

तुझे ये मलाल के हम तुझे याद नहीं करते,
हमें ये सुकून के हम तो जीते तुम्हें देखकर हैं//

तुम पूछती हो मुझसे मेरी पहचान क्या हैं,
और मैं खुद को तेरी नज़रों में ढूंढता हू आज भी//

निकली हो पल्लव सी, कलियों सी खिलती हो,
इठलाती, बलखाती, इतराती, और महकाती//

चंद फूलों से क्या तेरा श्रींगार करूं मैं,
तू तो खुद गुलाब सी कोमल और सुन्दर हो//

के आज मेरा दिन है, तुझसे भी ज्यादा,
के आज मैं तुझे जी भर के निहारूंगा//
(Dedicated to the birthday girl)
kundan vidyarthy.

Wednesday, 10 April 2013

दहाड़ता हुआ सा

कुछ शेर, जो आजकल मेरे अंदर उबलते हैं फिर शब्दों के रूप में बाहर आ जाते हैं. देखें कहाँ तक पहुचती है इसकी दहाड़........!!!

१ )   आवारों की बस्ती में फिरता रहा हूँ,
       तुझे याद अक्सर ही करता रहा हूँ,
       जाने कहाँ फिर दिखे तू मुझे, बस,
       ये उम्मीद लेके भटकता रहा हूँ///

२) लाल स्याही देख इसे खून न समझ लेना,
     हैं तो स्याही ही, लेकिन शब्द मेरे लहू से भींगे हैं//

३)   अच्छा हुआ के शीशा जानकार तोड़ दिया तुमने//
      अगर तुम ही नहीं तो ये दिल किस काम का//

४)   ना जाने भीड़ कैसी है, ना जाने होड कैसा है//
      मैं तो तन्हा ही फिसला था, मगर ये होड कैसा है//

५)   मेरी मोहब्बत का तुझे इल्म नहीं शायद//
      तेरा नाम पहले लेता हू और सांस बाद में//

६)   वो तो यूँही चोरी का इलज़ाम देते हैं मुझपर//
      चाहे तलाशी लेले, खुद के सिवा उन्हें कुछ नहीं मिलेगा//

७)   सब्र की बात भला पूछते हो तुम किस से//
      उम्र हमने भी काटी है उनकी राहों में//

८)   जिक्र जब भी मोहब्बत का आएगा//
      शायद तेरा नाम मेरे साथ ही लिया जाएगा//
      मेरा यूँ था के मैं जता भी ना सका//
      और तू खुद से भी छुपाती रह गयी//


९)   मुझे भूल जाना इतना आसान नहीं है ए सलमा//
       तू पलकें बंद करेगी, मैं खाबों में आ जाऊँगा//


१०)  मैं तो कबका छोड़ जाता ये सहर//
       बस डरता हू के तू मुझे और मैं तुझे भूल न जाऊं//
  

११)   एक बार फिर से बेहेक जाने के लिए तो आ//
        मनाने के लिए ना सही, सताने के लिए तो आ//
        मुझे तो बस तेरे दीदार की ललक है//
        दिल में भले ही ना बसना तू, मगर दिल तोड़ जाने के लिए तो आ//
                                                                         कुंदन विद्यार्थी

ये  थे कुछ शेर, जो दहाड़ने की कोशिश कर रहे थे. अब दहाड़ कहा तक पहुचती है ये तो बाद की बात है.

Wednesday, 30 January 2013

मेरा सहर है ये(गजल)

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,
मैं दीवाना हू तेरा,
खुद पे इलज़ाम क्यूँ समझते हो.

मैं भी इस भीर का हिस्सा हू,
मेरी पहचान हैं ये,
बड़ा हुआ इन्हीं गलियों में,
मेरी तो जान हैं ये,
मैं तो बेटा हू सहर का,
मुझे सामान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,

खफा था खुद से मैं खुद को,
भुलाए बैठा था,
शर्म से अपना ये चेहरा,
छुपाए बैठा था,
मैं तो अपना हू तेरा,
मुझे अनजान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,

ये माना दूर रहा तुमसे,
कुछ पलों के लिए,
ज़रा से पल थे वो या,
सदियो के लिए,
लो लौट आया हू मैं ये,
मेरा एहसान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,

तू लड़ खराए जो कभी,
मैं संभालूँगा तुझे,
मैं डूबकर भी साहिल पे,
पहुचाऊंगा तुझे,
मैं किनारा हू तेरा,
मुझे तूफ़ान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,

मैं दौर आऊंगा जब भी,
मुझे पुकारोगे,
छुपा लो दिल में,
कब तक यूँही सताओगे,
झुका हू दर पे तेरे,
मुझे बे-ईमान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो,

मुझे उम्मीद है तुमसे,
खड़ा हू राहों में,
यूँ दौर आओगे कभी तो,
सिमट के बाहों में,
यूँ दूर रेहने में मुझसे,
तुम अपनी शान क्यूँ समझते हो,

मेरा सहर है ये मुझको,
मेहमान क्यूँ समझते हो.
      कुंदन विद्यार्थी.





कहाँ रह गया रे. (गजल)

कहाँ गुम हुए सब कहाँ सब सहारे,
कहाँ रह गया तू कहाँ रह गया रे,
कहाँ तेरी मंजिल कहाँ हैं किनारे,
कहाँ रह गया तू कहाँ रह गया रे.

है तन्हा भटकता कहाँ दर-ब-दर तू,
न ही काफिला ना कोई आशियाँ रे,
तू ज़रा सांस ले बैठ जा एक पल को,
कदम लड़खराते हैं तू थक गया रे.

भवर में अटक सी गयी तेरी कश्ती,
ना किनारे कहीं, ना ही पतवार तेरा,
कैसे बच पाएगा सोच ले तू ज़रा फिर,
ना कोई रास्ता आ गयी आंधियां रे.

ना तलबगार तेरा कोई इस जहाँ में,
जबकि तू था मददगार सबके लिए ही,
तुझे क्या मिला उस भलाई के बदले,
रह गया तू अकेला निचे इस आसमां के.

फलसफा तेरा था तू न मायस होगा,
ना तू घबराएगा, मुस्कुराएगा हर पल,
आँख अबतक खुली, ना ही आंसू बहे हैं,
रह गए हैं तो बस, गुबारे गुबारे,

तेरी तकदीर लिख दी है ना जाने कैसी,
न कोई खुशी है, जहाँ देख गम है,
कर ना उम्मीद तू अपनी किस्मत से पगले,
है मुक़द्दर में तेरी दरारें दरारें.


कहाँ गुम हुए सब कहाँ सब सहारे,
कहाँ रह गया तू कहाँ रह गया रे,
कहाँ तेरी मंजिल कहाँ हैं किनारे,
कहाँ रह गया तू कहाँ रह गया रे.
                              कुंदन विद्यार्थी.